गुरु परम्परा
१. अस्मदगुरुभ्यो नमः
२. अस्मत्परमगुरुभ्यो नमः
३. अस्मत्सर्वगुरुभ्यो नमः
४. श्रीमते रामानुजाय नमः
५. श्रीपरान्कुशदासाय नमः
६. श्री मद्यामुनमुनये नमः
७. श्री राममिश्राय नमः
८. श्रीपुणडरिकाक्षाय नमः
९. श्रीमन्नाथमुनये नमः
१०. श्रीशठकोपाय नमः
११. श्रीमते विश्वक्सेनाय नमः
१२. श्रियै नमः
१३. श्रीधराय नमः

श्री भाष्यकार जगदगुरु श्रीरामानुजाचार्यजी महाराज
स्थान
वंश
जन्म
जन्म कुंडली
बालपन
विद्या गुरु
योग्यता
विवाह लग्न
कथामृत
जाप
धाम यात्रा

अनंत श्री विभूषित वेदांत शिरोमणि श्रीरामानुजाचार्यजी महाराज (संस्थापक श्री हरिदेव मन्दिर, वृन्दावन)
स्थान
आपके पूर्वज पाँच पीढी से करेली ग्राम जिला गोरखपुर से आकर बबुरा ग्राम जिला आरा में बसे थे | आपकी जन्मभूमि ननिहाल कल्याणपुर है जो की बबुरा से २८ मील है |
वंश
श्री १०८ श्री केशव प्रपन्नाचार्यजी आपके पूज्य पिताजी थे | परम सौभाग्यवती श्रीमती रामदुलारी जी आप की माता थी | आप की वंश परम्परा में शुचि आचार-विचार भगवत -भक्ति सदा से चली आ रही है, इस ही से यह वंश प्रसिद्ध एवं वैभवपूर्ण है |
जन्म
विक्रम सम्वत १९४५ शाके १८१० शुभ मिति आषाढ़ शुक्ला ८ मध्याहन समय कर्क संक्रांति चित्रा नक्षत्र में आपका प्रादुर्भाव हुआ |
जन्म कुंडली
पंडितों ने ग्रहों के फलादेश वर्णन किए | जन्म नाम रामानुज रखा गया | सारे ग्रह-अवतारी पुरषों से मिलते हुए देखकर यह जान लिया गया की यह बालक साधारण नही बल्कि अवतारी है | आपके चर्णारविन्दों और हस्त कमलों में विचित्र रेखायें और चक्रादी थे की जिनसे आपका अवतारी होना सहज ही सिद्ध होता है |
बालपन
आपकी बुद्धि बचपन से ही बड़ी तीव्र थी | आपका पाँच वर्ष की अवस्था ही में विद्या संस्कार करा दिया गया था | बड़े प्रेम और मनोयोग के साथ आप अध्ययन किया करते थे | संस्कृत से बड़ा ही प्रेम था | थोड़े ही दिनों में खूब पढने लगे | भगवत भक्ति में भी बचपन से ही अनुराग था |
विद्या गुरु
आपने पूज्यपाद श्री १०८ श्री सुदर्शनाचार्यजी से ‘ न्याय वेदांत ‘, एवं श्रीविद्याभूषण श्री लक्ष्मणाचार्यजी से ‘व्याकरण और काव्य शास्त्र’ तथा श्री १०८ श्री रामानुजदासजी महाराज से ‘श्रीसंप्रदाय रहस्य’ और श्री बलरामाचार्य स्वामीजी से ‘पंचरहस्य’ ज्ञान प्राप्त किया |
योग्यता
आप अपने सहपाठियों में सबसे प्रधान थे | कठिन से कठिन बात को भी सहज ही में ग्रहण कर लिया करते थे | हर एक प्रशन का उत्तर बड़ी सुगमता से दिया करते थे | एक दिन स्वामीजी ने सबकी परीक्षा ली | कुछ प्रश्न किए | किसी भी विद्याथी ने उन प्रश्नों का उत्तर ठीक-ठीक नही दिया | आपने शीघ्र ही यतार्थ गूढ़ अर्थ निरूपण कर दिया | इस पर स्वामीजी बड़े प्रसन्न हुए और आप को ह्रदय से लगा लिया और श्री भाष्य की पुस्तक आपके मस्तक पर धारण करा कर आशीर्वाद दिया की “श्रीसंप्रदाय के सिद्धांत और रहस्य का दिव्यज्ञान प्राप्त होगा” |
विवाह लग्न
शुभ मिति आषाढ़ शुक्ल ५ सम्वत १९५७ को विवाह निश्चय हुआ | लग्न पत्रिका रामपुर से बबुरा भेजी गई | दोनों और विवाह उत्सव की तैयारियाँ बड़े समारोह से होने लगी | मांगलिक गायन होने लगे |
कथामृत
एक दिन आपके पूज्यपाद श्री आचार्य चरण ने आपको श्री वाल्मीकि रामायण जी की कथा सुनाने की आज्ञा दी | आपको बड़ी कठिनाई प्रतीत हुई, क्योंकी आपको अभी तक ऐसे ग्रंथो के अवलोकन करने तक का ही सौभाग्य प्राप्त नही हुआ था | पुस्तक भी मौजूद नही थी, इसलिए रानी साहिबा चंपाबाईजी के यहाँ से मंगाकर श्री वरदान भगवन की सनिधि में स्थापित की गई | आप साष्टांग प्रणाम करके खड़े रहे | स्वामीजी महाराज ने अचर्क को आज्ञा दी की एक कटोरी में जल भर लाओ | अचर्क जल भर लाया | स्वामीजी ने जल आपके हस्त कमल में डालकर और अपना अंगूठा जल से स्पर्श करा कर कहा की यह पी जाओ | आपने ‘जय श्री भाष्यकार स्वामी जी की ‘ बोल कर श्री पाद तीर्थ पान कर किया | आपकी गुरु निष्ठा बड़ी ही अपूर्व थी | श्रीपादतीर्थ पान करते ही आवेश हो गया | साष्टांग प्रणाम करके भगवत सनिधी में व्यास गद्दी पर बिराजे और श्री रामायण जी की कथा आरम्भ की | कथा मंडप में श्रोतांगणों की बड़ी भीड़ लगी रहती थी | बड़े बड़े पंडित और महात्मा लोग कथा सुनने को उपस्थित होते थे | आपने श्री रामायण जी को कभी आँख उठाकर भी नही देखा था, फिर भी श्री स्वामीजी की कृपा से बड़े गंभीर और भावः पूर्ण अर्थ किया करते थे | जिससे उपस्थित जनता बड़ी संतुष्ट थी | आपकी कथा सुनने से सबको बड़ा आनंद और भक्ति का प्रत्यक्ष चमत्कार प्राप्त हुआ था | सब के सब इस मनोहर कथा को सुनकर मुग्ध हो जाते थे | एक बार भी रसास्वादन कर लेने पर लालसा बनी ही रहती थी | एक वर्ष तक कथा होती रही |
दिल्ली यात्रा
एक समय आप श्री बद्रीनारायणजी की यात्रा से लौटते समय दिल्ली मैं ठहर गए और कालषेप किया | आप के पधारने की सूचना होते ही जनता अधिक संख्या में उपस्तिथ हुई | आपने रात्रि के ९ बजे अपना प्रेममय उपदेश प्रारम्भ किया | प्रात: काल ५ बजे तक बराबर एक आसन पर विराज कर उपदेश देते रहे | सारी उपस्तिथ जनता मूर्तिमान होकर बराबर उपदेशामृत पान करती रही | व्याख्यान आपने ही समाप्त कर दिया फिर भी जनता लालायित ही रही |
जाप
मंत्र जाप करने में आप अदितीय है | मूलमंत्र और द्वयमंत्र का अजपा जाप सदा चलता रहता है | चर्ममंत्र का अनुसन्धान नित्य किया करते है | एक समय आपने आज्ञा लेकर मूलमंत्र के विधिपूर्वक आठ लाख जाप किए, जिससे भगवन के प्रत्यक्ष दर्शन हुए | आनंद की सीमा नही रही | शंख चक्रधारी कंज लोचन भगवान की मन मोहिनी छवि पर मुग्ध होकर परमानन्द सुख को अनुभव किया | गदगद हो गए | नेत्रों से अश्रु धारा उमड़ पड़ी | श्री चरणों की कोमलता, अरुणता और सुकुमारता को देखकर ह्रदय छटपटाने लगा | श्री चर्णार्विन्दों को पकडना चाहते थे की भगवान अंतर्ध्यान हो गए | अब तो विरह से अधीर होकर ह्रदय काँपने लगा | मन उसही मोहिनी छवि में लटक रहा था | सिवा चरणों के और कोई वस्तु नही सुहाती थी | प्रेम में डूबे हुए यह कह रहे थे “प्यारे कृष्ण ! कहाँ हो | मुझे अपने चरणों में क्यों नहीं लगाते |” खान पान सब बंद हो गया | कभी कभी फल सेवन कर लिया करते थे | इस विभोर दशा में आज्ञा हुई की एक करोड़ मन्त्र जाप होने पर दर्शन होंगे | इस पर आपने एक आसन पर बैठकर छै छै घंटे तक अट्ठाइस अट्ठाइस हज़ार जाप किए | जप समाप्त होने पर उस की ललित, माधुरी छवि के फिर दर्शन हुए | अब के श्री चरणों को स्पर्श करके ह्रदय की तपन बुझाई | आप की कीर्ति संसार में छागई और जय जय कार होने लगी |
धाम यात्रा
आपने अपने समस्त शिष्य मंडली में श्रीमान पंडित कमलनयनाचार्य जी को ही योग्य समझकर और भगवान की सन्निधि में इनको ले जाकर भगवान से श्री कमलनयन जी की और अपनी उंगुली से इशारा करते हुए प्रार्थना की - ” भगवान ! आज तक की तो दास की सेवा स्वीकार की जावे और दास का शरीर न रहने पर आगे यह ही तन मन धन से आपकी सेवा करेंगे और वैष्णव धर्म का प्रचार भी इन्ही के द्वारा होगा | दास की प्रार्थना स्वीकार हो जावे | ” इतनी सुनकर भगवान मुस्कराए | और स्वामी जी को भगवान की ऐसी छठा के दर्शन हुए की मानो कुछ भाव से बोलने वाले ही है | इस प्रकार दर्शन होने से स्वामी जी का दृढ विश्वास हो गया की भगवान ने श्री कमलनयन जी को ही उतराधिकारी के रूप में स्वीकार कर लिया है | फिर आप सब की सम्मति से मोटर में विराज होकर आगरा पधारे की जहाँ भगवान राधाकृष्ण जी का आपके चरण सम्बन्धी का एक मन्दिर है और वहाँ जाकर विराजे | आपको पंडित कमलनयन जी अस्पताल में ले गए | डॉक्टर ने आपके रोग के परीक्षा की | आपके शरीर में सब रुधिर का पानी हो गया था | रोग असाध्य हो गया | श्री स्वामीजी महाराज के मन में श्री मुक्तिनारायण धाम यात्रा की थी, इसलिए इस लोक में विराजमान मुक्तिनारायण के पास तो आप न जा सके और श्रीमंन्नारायण ने ही अपने पर स्वरुप के नित्य कैन्कर्य के लिए अपने निज धाम में बुला लिया | स्वामी जी महाराज ब्रह्म मुहूर्त में तीन बजकर चालीस मिनट पर ता. २६ जुलाई सन १९४८ मिति श्रावण कृष्ण ५ विक्रमीय सम्वत २००५ को अपने नश्वर शरीर को त्यागकर नित्य धाम में पधार गए | अंत समय तक द्वय मन्त्र का जप चलता रहा | आगरा में देहांत हुआ | परन्तु दाहसंस्कार आगरा न होकर वृन्दावन में हुआ | आगरे में आप के शव शरीर को मोटर में विराजमान कराके वृन्दावन लाया गया |
वृन्दावन में यह शब्द गुंजार रहे थे की एक धर्म का स्तम्भ वृन्दावन से उठ गया | परन्तु महात्मा पुरूष नही मरते | उनकी धर्म की कीर्ति रूपी पताका जगत में लहलहाती रहती है | इसलिए धर्मात्मा पुरूष तो मृत्यु को जीतते है और अमर बने रहते है | एक स्नेह की पूंजी उनके पास होती है जो उनके मृत्यु के वरण के कारण पुष्ट ही होती जाती है | अहम् के उदय के लिए उसमे कोई अवकाश नही छोड़ती |

अनंत श्री विभूषित श्री स्वामी कमलनयनाचार्यजी महाराज (द्वितीय आचार्य श्री हरिदेव मन्दिर, वृन्दावन)
जन्म
मार्गशीर्ष पक्ष उजयारी के परम पवित्र एकादशी के दिन सांय ५ बजे शुभ सम्वत १९६७ को आप इस धरा धाम पर पधारे | आपके कोमल तन की मनोहरता को देखकर आपके पिता श्रीमान पूज्य पंडित मधुसुदन जी महाराज सरयू पारीण ब्राह्मण त्रिपाठी अंगन फुले न समाये | श्रीमती सुखदेवी माताजी भी अपने नवल बालक को मंद - मंद मुस्कराता देखकर मन में हर्षित हो रही थी |
विद्या अध्ययन
आपने बालक अवस्था से ही नियमित भजन, नाम संकीर्तन को अपना अंग बना लिया | श्रद्धा, विश्वास, संयम, सादगी, इन्द्रिय निग्रह आदि सब साधन स्वत: ही अपने आप बालपन में ही बनने लगे | आठ वर्ष की आयु में आपका उपनयन संस्कार हुआ और इस साथ ही विद्या अध्ययन भी आरम्भ हो गया | आप एक प्राईमरी स्कूल में भरती हुए और ग्यारह वर्ष की आयु में प्राईमरी कोर्स को पूरा कर लिया | अंग्रेजी भाषा से आपको घृणा थी, इसलिए इसका ज्ञान आपने प्राप्त नही किया |
वृन्दावन
देव संयोग से आपको श्री हरीदेव मन्दिर घाट पर श्री १००८ श्री वेदांत शिरोमणि स्वामी रामानुजाचार्य महाराज एवं श्री हरिदेव जी के दर्शन हुए |
श्री मदभागवत
एक दिन संध्योपासन से निवृत होकर महात्मा की कुटी पर बैठे श्री गंगा की तरंगो का दर्शन कर रहे थे | वहां की शीतल पवन ह्रदय को अति सुहावन थी | श्री गंगाजी की कल्लोल रूपी ध्वनि गुंजायमान थी | प्रेम के व्यामोह की दशा में अचानक आपको श्रीमदभागवत के एक सौ आठ सप्ताह पारायण का भाव ह्रदय में जागृत हुआ | कैसा विलक्षण उच्च कोटि का भाव है |
स्वनामधन्य श्री १००८ श्रीस्वामी कमलनयनाचार्य जी महाराज अध्यक्ष श्रीहरिदेव मन्दिर, वृन्दावन की सेवा सराहनीय थी | जीवन के अन्तिम समय तक धीर, गंभीर, गुणों के समुद्र थे | श्रीरंगनाथ मन्दिर ( दिव्यदेश) वृन्दावन के ट्रस्टी बनकर बहुत बड़ी सेवा स्वामीजी ने की थी | श्री गोवर्धन पीठाधीश (बालक स्वामी) को श्री रंगनाथ भगवान की सेवा योग्य सुशिक्षित बनाने में आपका महान श्रेय है | सन १९६९ तक श्रीगोदा हरिदेव महाराज व भगवान श्रीगोदा रंगनाथ की सेवा रुग्णावस्ता में भी आपने संभाली | डा. श्री पी. एन. भार्गव, जयपुर, ने अन्तिम समय में रोग की अवस्था में जयपुर अपने बापू नगर स्तिथ मकान पर स्वामी जी की सेवा करते थे | उन्हीं डा. श्री पी. एन. भार्गव के सुपुत्र श्री डा. दिनेश भार्गव जी की वर्तमान में आयुर्विज्ञान संस्थान, दिल्ली से सेवा निवृत होकर अपोलो औषधालय, दिल्ली में कार्य - रत है, ने स्वामीजी महाराज की रुग्णावस्था में सेवा संभाल किया | सारी दवाएं, देखरेख उन्होंने की |
“सन १९६९ ई. के ज्येष्ठ मास अमावस्या को चित्रकुट धाम, भरतकूप के पास कोदारी ग्राम में किसी सेवा क्रम में प्रात: काल ४ बजे ब्रह्मरंध्र भेदन पूर्वक परमपद योगियों की भांति हो गया| महाराज श्री का कृत्य श्रीवैकुंठोत्सव श्रीधाम वृन्दावन हरिदेव मन्दिर में सविधि संपन्न हुआ|
बोलो श्रीगोदा हरिदेव भगवान की जय|”

श्री श्री १००८ श्रीमद जगदगुरु रामानुजाचार्य परमहंस परिव्राजकाचार्य त्रिदंडी जीयर स्वामी श्री देवनारायणाचार्य जी महाराज
स्थान
वंश
जन्म
जन्म कुंडली
बालपन
विद्या गुरु
योग्यता
विवाह लग्न
कथामृत
जाप
धाम यात्रा

श्री सुदर्शनाचार्यजी महाराज
स्थान
वंश
जन्म
जन्म कुंडली
बालपन
विद्या गुरु
योग्यता
विवाह लग्न
कथामृत
जाप
धाम यात्रा


